Skip to main content

Introduction of Patanjal Yoga Sutra and classification in four Padas / Chapters

Introduction of Patanjal Yoga Sutra and classification in four Padas / Chapters

योगसूत्र का सामान्य परिचय

महर्षि पतंजलि द्वारा रचित योगसूत्र ग्रन्थ योग का प्रामाणिक आधारग्रन्थ कहलाता है। इससे पूर्व योग के तत्वो का एक जगह पर संकलन देखने को नहीं मिलता। योग की जो परम्परा सृष्टि के आदि काल से चली आ रही थी, उसमे अनेक साधकों ने विभिन्न साधनाओं को सम्मिलित किया। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में योग की साधना का वास्तविक स्वरूप ,योग का  वास्तविक उद्देश्य प्रकट किया है। 

योगसूत्र ग्रन्थ में चार अध्याय हैं। समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद समाधिपाद में 51, साधनपाद में 55, विभूतिपाद में 55 तथा कैवल्यपाद मे 34 सूत्र हैं। इस प्रकार कुल 195 सूत्रों का सृजन करके योगविद्या को व्यवस्थित रुप में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया गया है। विविध पादो की विषयवस्तु का आपके अवलोकनार्थ वर्णन इस प्रकार है।

1. समाधिपाद 

इस पाद में 'अथ योगानुशासनम्’ सूत्र से ग्रन्थ का प्रारम्भ किया गया है। अथ शब्द मंगलवाची तथा आरम्भवाची है। जिसके द्वारा लक्षण, भेद, उपाय तथा फल सहित शिक्षा दी जाए वह अनुशासन कहलाता है। अत: इस सूत्र के माध्यम से परमेश्वर से सूत्रकार प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि 'मैं योग का लक्षण, भेद, उपाय का फलसहित वर्णन कर रहा हूँ, यह मेरा कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हो। 

योग का अर्थ चित्तवृत्ति निरोध के द्वारा दृष्टा की निजस्वरुप मे प्रतिष्ठित होना बताया गया है। यह एक लम्बी प्रक्रिया है जिसके अधिकारी अलग-अलग स्थिति के साधक हैं।
समाधिपाद में महर्षि पतंजलि द्वारा योग के फल कैवल्य या स्वरूपास्थिति योग के लक्ष्य को प्रकट कर दिया गया है। प्रमाण, विपर्य, विकल्प, निंद्रा व स्मृति पांच प्रकार की चित्तवृतियों का वर्णन करके चित्तवृति के निरोधो के उपाय के रूप में अभ्यास वैराग्य को बताया गया है। यही अभ्यास और वैराग्य की साधना राजयोग की साधना कहलाती है।

प्रमाण के तीन भेद प्रत्यक्ष, अनुमान व आगम का वर्णन किया गया है। अभ्यास को दृढ़ करने के उपाय, वैराग्य की स्थिति को स्पष्ट किया गया है। सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेदो वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत तथा अस्मित्तानुगत का विस्तार से वर्णन किया गया है। परवैराग्य की अवस्था तथा इनके द्वारा प्राप्त होने वाली असम्प्रज्ञात समाधि को लक्ष्य कहा गया है। 

भवप्रत्यय समाधि, विदेह तथा प्रकृतिलयों को प्राप्त होती है, अन्य के लिए उपाय प्रत्यय है जिसके साधन श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रजा कहे गए हैं। तीव्र  संवेग से शीघ्र समाधि लाभ होने तथा समाधि प्राप्ति के उपाय के रूप में ईश्वरप्रणिधान का उल्लेख किया गया है। ईश्वर का स्वरूप बताया गया है जिसमे अन्य पुरुषों से ईश्वर की भिन्नता कही गई है, बताया यया है-

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः। यो.सू. 1 / 24

ईश्वर प्रणिधान के विशेष फल प्रत्य्चेतना का साक्षात्कार तथा अन्तरायों का अभाव बताया है। ईश्वर प्रणिधान से समाधि सिद्धि तथा ईश्वर का साक्षात्कार दोनो सम्भव है। इसी को भक्तियोग के रूप में कहा जा सकता है। साधना के विघ्न (अन्तरायों) व्याधि, स्त्याऩ, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अल्पब्धभूमिकत्व तथा अनवस्थितत्व के अतिरिक्त इन अन्तरायों के सहभुव: दुःख, दौर्मनस्य, अंगमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास का वर्णन करके इनके निराकरण का दूसरा उपाय 'एकतत्वाभ्यास' बताया गया है।

चित्त को समाहित करने के लिए चित्त की निर्मलता आवश्यक है।  चित्त की निर्मलता प्राप्ति हेतु मैत्री, करुणा, मुदिता तथा उपेक्षा की भावनाओं को धारण करना चाहिए ।

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्त प्रसादनम् । यो.सू. 1 / 3 3

अर्थात चित्त को सदैव प्रसन्न रखने के लिए उपाय रूप में सुखी व्यक्तियों को देखकर उनसे मित्रता का भाव, दुखी के प्रति करुणा का भाव, पुण्यशाली के प्रति प्रसत्नता का भाव तथा पापी को देखकर उसकी उपेक्षा करने के भाव से चित्त मे समरसता बनी रहती है तथा उद्वेग नही होता। प्राणायाम, विषयवती प्रवृत्ति, विशोका या ज्योतिष्मती प्रवृति, वीतराग चित्त, स्वप्न तथा निद्रा, यथाभिमत ध्यान आदि के माध्यम से चित्त की एकाग्रता होने का वर्णन है। ऐसे एकाग्र चित्त मे समापत्ति हो जाती है जो चार प्रकार की है सवितर्का, निर्वितर्का, सविचार व निर्विचार। इनसे बुद्धि मे प्रसन्नता तथा निर्मलता रूपी अध्यात्मप्रसाद ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त हो जाती है जिससे विवकेख्याति का उदय होने पर निर्बीज समाधि की भूमि तैयार हो जाती है। विवेकख्याति का भी निरोध हो जाने पर असम्ज्ञात या निर्बीज समाधि सिद्ध हो जाती है।

2. साधन पाद

साधनपाद मध्यम अधिकारियों के लिए साधना की विधि से प्रारम्भ होता है। तप, स्वाध्याय व ईश्वर प्रणिधान रूप क्रियायोग को समाधि की प्राप्ति तथा क्लेशों को कमजोर करने के लिए उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पांच क्लेशों अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश के स्वरूप का वर्णन, परिणाम. ताप व संस्कार दुःखो का वर्णन, दुःखरूप जगत् का व्याख्यान करके हेय, हेयहेतु, हान तथा हानोयाय रूपी चतुर्व्यूह का वर्णन किया गया है। दृश्य, (प्रकृति) का स्वरुप तथा प्रयोजन निम्नलिखित सूत्र द्वारा प्रकट किया गया है

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूत्तेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्। योगसूत्र 2 / 18

अर्थात प्रकाश, क्रिया और स्थिति जिसका स्वभाव है, भूत ओंर इन्द्रिय जिसका स्वरूप हैं, भोग तथा अपवर्ग जिसका प्रयोजन हैँ, वह दृश्य है। सत्व, रजस व तमस गुण तथा इनसे जो भी बना है, वह दृश्य है। पॉच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, एक मन तथा पाँच महाभूत इन 16 तत्वो को विशेष कहा गया है। पाँच तन्नमात्रा तथा एक अहंकार को अविशेष, महत् को लिंगमात्र तथा मूलप्रकृति को अलिंग कहा है। द्रष्टा देखने की शक्तिमात्र है। वह निर्विकार होते हुए भी चित्त की वृत्तियों के अनुसार देखता है। अविद्या के कारण द्रष्टा व दृश्य का संयोग होता है, जो दुःखो का कारण है। विवकेख्याति द्वारा द्रष्टा व दृश्य का यथार्थ ज्ञान होने से कैवल्य की उपलब्धि होती है। योग के अंग  यम नियम आदि के अनुष्ठान से अशुद्धि का नाश होने के कारण ज्ञान का प्रकाश विवकेख्याति पर्यन्त हो जाता है। यहां नवीन साधको या अधम साधकों के लिए अष्टांयोग का वर्णन किया गया है जिसके प्रथम 5 अंगो को बहिरंग योग कहा है तथा साधनपाद में अष्टांगयोग के यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार पांच अंगो का वर्णन किया गया है तथा धारणा, ध्यान व समाधि को अंतरंग योग कहा गया है जिनका वर्णन विभूतिपाद में किया गया है।

3. विभूतिपाद

विभूतिपाद का प्रारम्भ धारणा, ध्यान और समाधि के लक्षणों द्वारा होता है। इन तीनो के एक ही स्थान पर होने को संयम कहा गया है। संयम के सिद्ध होने पर समाधि प्रज्ञा का प्रकाश होता है। चित्त के निरोधपरिणाम, समाधिपरिणाम व एकाग्रता परिणाम की चर्चा की गईं है। भूत व इन्द्रियो के धर्म, लक्षण व अवस्था परिणाम पर प्रकाश डाला गया है। इसके पश्चात् संयमजन्य विभूतियों का वर्णन किया गया है, जो इस प्रकार कही गई हैं

1. अतीतानागतज्ञाऩम्  2. सर्वभूतरुतज्ञानम् 3. पूर्वजातिज्ञानम् 4. परचित्तज्ञानम् 5. अन्तर्धानम् 6. अपरान्तज्ञान 7. मैत्रयादिबलप्राप्ति 8. हस्थ्यादिबलप्राप्ति 9. सूक्ष्यव्यवहितविप्रकृष्टज्ञान 10.. भुवनजानम् 11. ताराव्यूहज्ञानम् 12. तारागतिजानम् 13. कायाव्यूहज्ञानम् 14. क्षुत्पिपासानिवृति 15. स्थिरता 16. सिद्धदर्शऩ 17. त्रैकालिक पदार्थज्ञानम् 18. चित्तसंवित् 19. पुरुषज्ञानम् 20. प्रतिभज्ञान 21. श्रावणज्ञान 22. वेदनाज्ञान 23. आदर्शज्ञान 24. आस्वादज्ञान 25. वार्ताज्ञान 26. परकायप्रवेश 27. जल, पंक तथा कण्टक के ऊपर स्वच्छन्द गमन 28. ऊर्ध्वलोकगमन 29. ज्वलन 30. दिव्य श्रोत्र 31. आकाशगमन, 32. प्रकाशावरणक्षय 33. भूतजय, 34. अणिमा, 35. लघिमा, 36. महिमा, 37. गरिमा. 38. प्राप्ति, 39. प्राकाम्य, 40. ईशित्व 41. वशित्व 42. कायसम्पत, 43. अभिघाताभाव 44. इन्द्रियजय, 45. मनोजवित्व 46. विकरणभाव 47. प्रधानजय, 48. सर्वाधिष्ठातृत्व 49. सर्धज्ञत्व ।

4. कैवल्यपाद

इस पाद के प्रथम सूत्र में बताया गया है कि संयमजन्य सिद्धियों के अतिरिक्त जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि द्वारा भी सिद्धियॉ प्राप्त होती हैं। तप आदि के द्वारा जैसे जैसे तामसिक व राजसिक वृत्तियों का नाश तथा सत्व का प्रकाश होता है तो वैसे वैसे साधक में भक्ति संचरण होता जाता है। इस प्रकार वह पूर्व की अपेक्षा अधिक शक्ति सम्पन्न हो जाता है। समाधि या ध्यान से उत्पन्न होने वाला चित्त वासना रहित होने के कारण श्रेष्ठ कहा गया है। कर्म के चार प्रकार बताएं हैं शुक्ल (पुण्य) कृष्ण (पाप) शुक्ल कृष्ण (पुण्य पाप) तथा अशुक्लाकृष्ण (पुण्य पाप रहित) । प्रथम तीन प्रकार के कर्म सामान्य मनुष्य के होते हैं तथा चतुर्थ प्रकार का कर्म अशुक्लाकृष्ण योगी का होता हैं। इन्हे ही अनासक्त कर्म कहा गया है। प्रथम तीन प्रकार के कर्मो के कारण ही वासनाएं चित्त में एकत्र होती हैं तथा उन्ही के फल भोगने हेतु जन्म लेना पडता है। ये वासनाएं हेतु, फल, आश्रय व आलम्बन पर आधारित होती हैं। इनका हेतु अविद्या आदि क्लेश तथा सकाम तीनो प्रकार के कर्म, इनका फल जाति, आयु तथा भोग है। वासनाओं का आश्रय चित्त तथा आलम्बन इन्द्रियों के विषय कहे गए हैं। इससे आगे पुरुष व चित्त में भेद बताकर पुरुष के स्वरुप को समाधि द्वारा जानने का वर्णन किया गया है। विवेकज्ञान होने पर साधक का चित कैवल्य की और गति करने वाला होता है, किन्तु कभी- कभी पूर्वजन्मो के संस्कार होने के कारण ऐसे चित्त में भी व्युत्थान की वृत्तियाँ उत्पन्न होने लगती हैं। उनकी निवृत्ति क्लेशों की तरह कही गईं है ‘हानमेषां क्लेशवदुक्तम्’ । विवेकख्याति या प्रसंख्यान ज्ञान से भी विरक्त होने पर योगी में निरन्तर विवेकख्याति का प्रवाह होने को धर्ममेघ समाधि कहा गया है। यह विवेकख्याति की परिपक्व अवस्था है। इसकी पराकाष्ठा ज्ञानप्रसाद नामक परवैराग्य को कहा गया है जिसका फल असमप्रज्ञात समाधि है। जिसमे संस्कार दग्धबीज होकर क्लेशकर्म की निवृति हो जाती है। इस समय ज्ञान का प्रकाश इतना अधिक होता है’ कि जानने योग्य कुछ शेष नहीं बचता। गुणो के परिणामक्रम की समाप्ति हो जाती है। गुणों की प्रवृति पुरूष के भोग व मोक्ष के लिए होती है। जब तक ये दोनो लक्ष्य पूर्ण नहीँ होते तब तक शरीर इन्द्रियों आदि के क्रम चलाते रहते हैं। मोक्ष की स्थिति प्राप्त होने से परिणामक्रम टूट जाता है तथा पुरुषार्थ शून्य गुणों का अपने कारण (मूलप्रकृति) मे प्रतिप्रसव हो जाता है, यही कैवल्य है तथा पुरुष का निज-स्वरूप में प्रतिष्ठा होना कहा जाता है।
'तदा द्रष्टुः स्वरुपेऴवस्थाम् '   (यो.सू. 1 / 3)  

Introduction of Patanjal Yoga Sutra and classification in four Padas / Chapters

Download pdf File

श्रीमद्भगवद्गीता का सामान्य परिचय

योग का उद्देश्य | योग का महत्व


 

Comments

Popular posts from this blog

"चक्र " - मानव शरीर में वर्णित शक्ति केन्द्र

7 Chakras in Human Body हमारे शरीर में प्राण ऊर्जा का सूक्ष्म प्रवाह प्रत्येक नाड़ी के एक निश्चित मार्ग द्वारा होता है। और एक विशिष्ट बिन्दु पर इसका संगम होता है। यह बिन्दु प्राण अथवा आत्मिक शक्ति का केन्द्र होते है। योग में इन्हें चक्र कहा जाता है। चक्र हमारे शरीर में ऊर्जा के परिपथ का निर्माण करते हैं। यह परिपथ मेरूदण्ड में होता है। चक्र उच्च तलों से ऊर्जा को ग्रहण करते है तथा उसका वितरण मन और शरीर को करते है। 'चक्र' शब्द का अर्थ-  'चक्र' का शाब्दिक अर्थ पहिया या वृत्त माना जाता है। किन्तु इस संस्कृत शब्द का यौगिक दृष्टि से अर्थ चक्रवात या भँवर से है। चक्र अतीन्द्रिय शक्ति केन्द्रों की ऐसी विशेष तरंगे हैं, जो वृत्ताकार रूप में गतिमान रहती हैं। इन तरंगों को अनुभव किया जा सकता है। हर चक्र की अपनी अलग तरंग होती है। अलग अलग चक्र की तरंगगति के अनुसार अलग अलग रंग को घूर्णनशील प्रकाश के रूप में इन्हें देखा जाता है। योगियों ने गहन ध्यान की स्थिति में चक्रों को विभिन्न दलों व रंगों वाले कमल पुष्प के रूप में देखा। इसीलिए योगशास्त्र में इन चक्रों को 'शरीर का कमल पुष्प” कहा ग...

सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति सामान्य परिचय

प्रथम उपदेश- पिण्ड उत्पति विचार सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति अध्याय - 2 (पिण्ड विचार) सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति के अनुसार नौ चक्रो के नाम 1. ब्रहमचक्र - मूलाधार मे स्थित है, कामनाओं की पूर्ति होती हैं। 2. स्वाधिष्ठान चक्र - इससे हम चीजो को आकर्षित कर सकते है। 3. नाभी चक्र - सिद्धि की प्राप्ति होती है। 4. अनाहत चक्र - हृदय में स्थित होता है। 5. कण्ठचक्र - विशुद्धि-संकल्प पूर्ति, आवाज मधुर होती है। 6. तालुचक्र -  घटिका में, जिह्वा के मूल भाग में,  लय सिद्धि प्राप्त होती है। 7. भ्रुचक्र -     आज्ञा चक्र - वाणी की सिद्धि प्राप्त होती है। 8. निर्वाणचक्र - ब्रहमरन्ध्र, सहस्त्रार चक्र, मोक्ष प्राप्ति 9. आकाश चक्र - सहस्त्रारचक्र के ऊपर,  भय- द्वेष की समाप्ति होती है। सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति के अनुसार सोहल आधार (1) पादांगुष्ठ आधार (2) मूलाधार (3) गुदाद्वार आधार (4) मेद् आधार (5) उड्डियान आधार (6) नाभी आधार (7) हृदयाधार (8) कण्ठाधार (9) घटिकाधार (10) तालु आधार (11) जिह्वा आधार (12) भ्रूमध्य आधार (13) नासिका आधार (14) नासामूल कपाट आधार (15) ललाट आधार (16) ब्रहमरंध्र आधार सिद्ध...

हठयोग प्रदीपिका में वर्णित प्राणायाम

हठयोग प्रदीपिका में प्राणायाम को कुम्भक कहा है, स्वामी स्वात्माराम जी ने प्राणायामों का वर्णन करते हुए कहा है - सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारी शीतल्री तथा।  भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा प्लाविनीत्यष्टकुंम्भका:।। (हठयोगप्रदीपिका- 2/44) अर्थात् - सूर्यभेदन, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और प्लाविनी में आठ प्रकार के कुम्भक (प्राणायाम) है। इनका वर्णन ऩिम्न प्रकार है 1. सूर्यभेदी प्राणायाम - हठयोग प्रदीपिका में सूर्यभेदन या सूर्यभेदी प्राणायाम का वर्णन इस प्रकार किया गया है - आसने सुखदे योगी बदध्वा चैवासनं ततः।  दक्षनाड्या समाकृष्य बहिस्थं पवन शनै:।।  आकेशादानखाग्राच्च निरोधावधि क्रुंभयेत। ततः शनैः सव्य नाड्या रेचयेत् पवन शनै:।। (ह.प्र. 2/48/49) अर्थात- पवित्र और समतल स्थान में उपयुक्त आसन बिछाकर उसके ऊपर पद्मासन, स्वस्तिकासन आदि किसी आसन में सुखपूर्वक मेरुदण्ड, गर्दन और सिर को सीधा रखते हुए बैठेै। फिर दाहिने नासारन्ध्र अर्थात पिंगला नाडी से शनैः शनैः पूरक करें। आभ्यन्तर कुम्भक करें। कुम्भक के समय मूलबन्ध व जालन्धरबन्ध लगा कर रखें।  यथा शक्ति कुम्भक के प...

हठयोगप्रदीपिका में वर्णित मुद्रायें, बंध

  हठयोगप्रदीपिका में वर्णित मुद्रायें, बंध हठयोग प्रदीपिका में मुद्राओं का वर्णन करते हुए स्वामी स्वात्माराम जी ने कहा है महामुद्रा महाबन्धों महावेधश्च खेचरी।  उड़्डीयानं मूलबन्धस्ततो जालंधराभिध:। (हठयोगप्रदीपिका- 3/6 ) करणी विपरीताख्या बज़्रोली शक्तिचालनम्।  इदं हि मुद्रादश्क जरामरणनाशनम्।।  (हठयोगप्रदीपिका- 3/7) अर्थात महामुद्रा, महाबंध, महावेध, खेचरी, उड्डीयानबन्ध, मूलबन्ध, जालन्धरबन्ध, विपरीतकरणी, वज़्रोली और शक्तिचालनी ये दस मुद्रायें हैं। जो जरा (वृद्धा अवस्था) मरण (मृत्यु) का नाश करने वाली है। इनका वर्णन निम्न प्रकार है।  1. महामुद्रा- महामुद्रा का वर्णन करते हुए हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है- पादमूलेन वामेन योनिं सम्पीड्य दक्षिणम्।  प्रसारितं पद कृत्या कराभ्यां धारयेदृढम्।।  कंठे बंधं समारोप्य धारयेद्वायुमूर्ध्वतः।  यथा दण्डहतः सर्पों दंडाकारः प्रजायते  ऋज्वीभूता तथा शक्ति: कुण्डली सहसा भवेतत् ।।  (हठयोगप्रदीपिका- 3/9,10)  अर्थात् बायें पैर को एड़ी को गुदा और उपस्थ के मध्य सीवन पर दृढ़ता से लगाकर दाहिने पैर को फैला कर रखें...

चित्त | चित्तभूमि | चित्तवृत्ति

 चित्त  चित्त शब्द की व्युत्पत्ति 'चिति संज्ञाने' धातु से हुई है। ज्ञान की अनुभूति के साधन को चित्त कहा जाता है। जीवात्मा को सुख दुःख के भोग हेतु यह शरीर प्राप्त हुआ है। मनुष्य द्वारा जो भी अच्छा या बुरा कर्म किया जाता है, या सुख दुःख का भोग किया जाता है, वह इस शरीर के माध्यम से ही सम्भव है। कहा भी गया  है 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' अर्थात प्रत्येक कार्य को करने का साधन यह शरीर ही है। इस शरीर में कर्म करने के लिये दो प्रकार के साधन हैं, जिन्हें बाह्यकरण व अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। बाह्यकरण के अन्तर्गत हमारी 5 ज्ञानेन्द्रियां एवं 5 कर्मेन्द्रियां आती हैं। जिनका व्यापार बाहर की ओर अर्थात संसार की ओर होता है। बाह्य विषयों के साथ इन्द्रियों के सम्पर्क से अन्तर स्थित आत्मा को जिन साधनों से ज्ञान - अज्ञान या सुख - दुःख की अनुभूति होती है, उन साधनों को अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। यही अन्तःकरण चित्त के अर्थ में लिया जाता है। योग दर्शन में मन, बुद्धि, अहंकार इन तीनों के सम्मिलित रूप को चित्त के नाम से प्रदर्शित किया गया है। परन्तु वेदान्त दर्शन अन्तःकरण चतुष्टय की...

चित्त विक्षेप | योगान्तराय

चित्त विक्षेपों को ही योगान्तराय ' कहते है जो चित्त को विक्षिप्त करके उसकी एकाग्रता को नष्ट कर देते हैं उन्हें योगान्तराय अथवा योग के विध्न कहा जाता।  'योगस्य अन्तः मध्ये आयान्ति ते अन्तरायाः'।  ये योग के मध्य में आते हैं इसलिये इन्हें योगान्तराय कहा जाता है। विघ्नों से व्यथित होकर योग साधक साधना को बीच में ही छोड़कर चल देते हैं। विध्न आयें ही नहीं अथवा यदि आ जायें तो उनको सहने की शक्ति चित्त में आ जाये, ऐसी दया ईश्वर ही कर सकता है। यह तो सम्भव नहीं कि विध्न न आयें। “श्रेयांसि बहुविध्नानि' शुभकार्यों में विध्न आया ही करते हैं। उनसे टकराने का साहस योगसाधक में होना चाहिए। ईश्वर की अनुकम्पा से यह सम्भव होता है।  व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः (योगसूत्र - 1/30) योगसूत्र के अनुसार चित्त विक्षेपों  या अन्तरायों की संख्या नौ हैं- व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व। उक्त नौ अन्तराय ही चित्त को विक्षिप्त करते हैं। अतः ये योगविरोधी हैं इन्हें योग के मल...

आसन का अर्थ एवं परिभाषायें, आसनो के उद्देश्य

आसन का अर्थ आसन शब्द के अनेक अर्थ है जैसे  बैठने का ढंग, शरीर के अंगों की एक विशेष स्थिति, ठहर जाना, शत्रु के विरुद्ध किसी स्थान पर डटे रहना, हाथी के शरीर का अगला भाग, घोड़े का कन्धा, आसन अर्थात जिसके ऊपर बैठा जाता है। संस्कृत व्याकरंण के अनुसार आसन शब्द अस धातु से बना है जिसके दो अर्थ होते है। 1. बैठने का स्थान : जैसे दरी, मृग छाल, कालीन, चादर  2. शारीरिक स्थिति : अर्थात शरीर के अंगों की स्थिति  आसन की परिभाषा हम जिस स्थिति में रहते है वह आसन उसी नाम से जाना जाता है। जैसे मुर्गे की स्थिति को कुक्कुटासन, मयूर की स्थिति को मयूरासन। आसनों को विभिन्न ग्रन्थों में अलग अलग तरीके से परिभाषित किया है। महर्षि पतंजलि के अनुसार आसन की परिभाषा-   महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के साधन पाद में आसन को परिभाषित करते हुए कहा है। 'स्थिरसुखमासनम्' योगसूत्र 2/46  अर्थात स्थिरता पूर्वक रहकर जिसमें सुख की अनुभूति हो वह आसन है। उक्त परिभाषा का अगर विवेचन करे तो हम कह सकते है शरीर को बिना हिलाए, डुलाए अथवा चित्त में किसी प्रकार का उद्वेग हुए बिना चिरकाल तक निश्चल होकर एक ही स्थिति में सु...

हठयोग प्रदीपिका के अनुसार षट्कर्म

हठप्रदीपिका के अनुसार षट्कर्म हठयोगप्रदीपिका हठयोग के महत्वपूर्ण ग्रन्थों में से एक हैं। इस ग्रन्थ के रचयिता योगी स्वात्माराम जी हैं। हठयोग प्रदीपिका के द्वितीय अध्याय में षटकर्मों का वर्णन किया गया है। षटकर्मों का वर्णन करते हुए स्वामी स्वात्माराम  जी कहते हैं - धौतिर्बस्तिस्तथा नेतिस्त्राटकं नौलिकं तथा।  कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि प्रचक्षते।। (हठयोग प्रदीपिका-2/22) अर्थात- धौति, बस्ति, नेति, त्राटक, नौलि और कपालभोंति ये छ: कर्म हैं। बुद्धिमान योगियों ने इन छः कर्मों को योगमार्ग में करने का निर्देश किया है। इन छह कर्मों के अतिरिक्त गजकरणी का भी हठयोगप्रदीपिका में वर्णन किया गया है। वैसे गजकरणी धौतिकर्म के अन्तर्गत ही आ जाती है। इनका वर्णन निम्नलिखित है 1. धौति-  धौँति क्रिया की विधि और  इसके लाभ एवं सावधानी- धौँतिकर्म के अन्तर्गत हठयोग प्रदीपिका में केवल वस्त्र धौति का ही वर्णन किया गया है। धौति क्रिया का वर्णन करते हुए योगी स्वात्माराम जी कहते हैं- चतुरंगुल विस्तारं हस्तपंचदशायतम। . गुरूपदिष्टमार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैर्गसेत्।।  पुनः प्रत्याहरेच्चैतदुदितं ध...

Information and Communication Technology विषय पर MCQs (Set-3)

  1. "HTTPS" में "P" का अर्थ क्या है? A) Process B) Packet C) Protocol D) Program ANSWER= (C) Protocol Check Answer   2. कौन-सा उपकरण 'डेटा' को डिजिटल रूप में परिवर्तित करता है? A) हब B) मॉडेम C) राउटर D) स्विच ANSWER= (B) मॉडेम Check Answer   3. किस प्रोटोकॉल का उपयोग 'ईमेल' भेजने के लिए किया जाता है? A) SMTP B) HTTP C) FTP D) POP3 ANSWER= (A) SMTP Check Answer   4. 'क्लाउड स्टोरेज' सेवा का एक उदाहरण क्या है? A) Paint B) Notepad C) MS Word D) Google Drive ANSWER= (D) Google Drive Check Answer   5. 'Firewall' का मुख्य कार्य क्या है? A) फाइल्स को एनक्रिप्ट करना B) डेटा को बैकअप करना C) नेटवर्क को सुरक्षित करना D) वायरस को स्कैन करना ANSWER= (C) नेटवर्क को सुरक्षित करना Check Answer   6. 'VPN' का पू...

Yoga MCQ Questions Answers in Hindi

 Yoga multiple choice questions in Hindi for UGC NET JRF Yoga, QCI Yoga, YCB Exam नोट :- इस प्रश्नपत्र में (25) बहुसंकल्पीय प्रश्न है। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक है। सभी प्रश्न अनिवार्य ।   1. किस उपनिषद्‌ में ओंकार के चार चरणों का उल्लेख किया गया है? (1) प्रश्नोपनिषद्‌         (2) मुण्डकोपनिषद्‌ (3) माण्डूक्योपनिषद्‌  (4) कठोपनिषद्‌ 2 योग वासिष्ठ में निम्नलिखित में से किस पर बल दिया गया है? (1) ज्ञान योग  (2) मंत्र योग  (3) राजयोग  (4) भक्ति योग 3. पुरुष और प्रकृति निम्नलिखित में से किस दर्शन की दो मुख्य अवधारणाएं हैं ? (1) वेदांत           (2) सांख्य (3) पूर्व मीमांसा (4) वैशेषिक 4. निम्नांकित में से कौन-सी नाड़ी दस मुख्य नाडियों में शामिल नहीं है? (1) अलम्बुषा  (2) कुहू  (3) कूर्म  (4) शंखिनी 5. योगवासिष्ठानुसार निम्नलिखित में से क्या ज्ञानभूमिका के अन्तर्गत नहीं आता है? (1) शुभेच्छा (2) विचारणा (3) सद्भावना (4) तनुमानसा 6. प्रश्नो...