Skip to main content

Teaching Aptitude MCQ (download pdf) for ugc net

UGC NET JRF Paper 1 Teaching Aptitude MCQ's in hindi with Answers

Teaching Aptitude mcq for NET, Teaching Aptitude mcq for SET, Teaching Aptitude question and answers, Teaching Aptitude mcq in hindi, Teaching aptitude mcq for b.ed entrance exam.


Teaching Aptitude MCQ Part-2


1. अधिगम में, शिक्षक की भूमिकाओं का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष क्या है?

(1) आन्तरिक विकास करना, जो पर्याप्त निष्पादन के रचकों में परिणत्त हो जाएँ

(2) आन्तरिक विकास करना, जिससे खतरों एवं किसी के जाल में फैसने से बचा जा सके

(3) प्रोत्साहन एवं नैतिक सहारा देने का प्रबन्ध करना

(4) सतत निदान एवं उपचार सहायता का प्रबन्ध करना

 

2. अधिगम (सीखने) का सर्वाधिक उपयुक्त उद्देश्य है

(1) वैयक्तिक समायोजन

(2) व्यवहार का रूपान्तरण

(3) सामाजिक एवं राजनैतिक चेतना

(4) अपने को रोजगार के लिये तैयार करना

 

3. जो छात्र कक्षा में सवाल पूछते रहते हैं-

(1) उन्हें स्वतन्त्र रूप से उत्तर प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिये

(2) कक्षा के बाद अध्यापक से मिलने की सलाह दी जानी चाहिए

(3) उन्हें हमेशा सवाल पूछते रहने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए

(4) व्याख्यान के बीच में बाधा न डालने की सलाह दी जानी चाहिए

 

4. छात्रों की अधिकतम प्रतिभागिता संभव है-

(1) परिचर्चा विधि द्वारा

(2) व्याख्यान विधि द्वारा

(3) श्रव्य-दृश्य साधनों द्वारा

(4) पाठ्य-पुस्तक विधि द्वारा

 

5. अध्यापक दृश्य साधनों का उपयोग अध्यापन को निम्नलिखित बनाने के लिए करता है

(1) सरल

(2) अधिक ज्ञान के लिए

(3) समय कम करने के लिए

(4) रुचिकर बनाने के लिए

 

6. उच्चशिक्षा में अध्यापक की भूमिका का लक्ष्य है-

(1) छात्रों को सूचना प्रदान करना

(2) छात्रों में स्व-अध्ययन को प्रोत्साहित करना

(3) छात्रों में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना

(4) छात्रों की व्यक्तिगत समस्याओं के समाधन हेतु सहायता करना

 

7. नीचे लिखे गुणों वाला कौन अध्यापक आपको सबसे अच्छा लगता है? 

(1) विषय-विशेषज्ञ एवं समय का पाबंद

(2) अनुसंधान की ओर प्रवृत्त

(3) लोकप्रिय और आदर्शवादी दर्शन वाला

(4) जो प्राय: छात्रों का मनोरंजन करता है

 

8. माइक्रोशिक्षण छात्र-अध्यापकों के लिए किस अवधि में सबसे अधिक प्रभावशाली होता है?

(1) शिक्षण-अभ्यास के दौरान

(2) शिक्षण-अभ्यास के बाद

(3) शिक्षण-अभ्यास से पहले

(4) उपर्युक्त में कोई नहीं

 

9. अध्यापन में सबसे अनावश्यक कारक कौन है?

(1) छात्रों को दण्ड देना

(2) कक्षा में अनुशासन रखना

(3) प्रभावशाली ढंग से व्याख्यान देना

(4) ब्लैकबोर्ड पर चित्र और रेखाचित्र बनाना

 

10. निम्न में से कौन-सी अनुदेशन सामग्री नहीं है?

(1) ओवर हेड प्रोजेक्टर

(2) आडियो कैसेट

(3) छपी सामग्री

(4) ट्रान्सपरेन्सी

 

11. निम्न में से कौन-सा कथन सही नहीं है?

(1) तर्कशक्ति का विकास व्याख्यान विधि द्वारा हो सकता है

(2) ज्ञान का विकास व्याख्यान-विधि द्वारा हो सकता है

(3) व्याख्यान-विधि एक तरफा प्रक्रिया है

(4) व्याख्यान विधि के दौरान छात्र निष्क्रिय होते हैं

 

12. उच्चशिक्षा के स्तर पर शिक्षण का मुख्य उद्देश्य है-

(1) छात्रों को परीक्षा पास करने के लिए तैयार करना

(2) निर्णय लेने की क्षमता का विकास करना

(3) नई जानकारी देना

(4) व्याख्यान के दौरान प्रश्न पूछने के लिए छात्रों को प्रेरित करना

 

13. निम्न में से कौन सा कथन सही है?

(1) विश्वसनीयता, बैधता को सुनिश्चित करती है

(2) वैधता, विश्वसनीयता को सुनिश्चित करती है

(3) विश्वसनीयता और वैधता एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं

(4) विश्वसनीयता, वस्तुनिष्ठता पर निर्भर नहीं करती

 

14. निम्नलिखित में से कौन-सा मूल्यांकन को इंगित करता है?

(1) राम को 200 में से 45 अंक प्राप्त हुये

(2) मोहन को अंग्रेजी में 38 प्रतिशत अंक प्राप्त हुये

(3) श्याम अंतिम परीक्षा में प्रथम श्रेणी में पास हुआ

(4) उपर्युक्त सभी

 

15. अधोलिखित में से अध्यापन-कौशल किसमें है?

(1) श्याम-पट्ट लेखन

(2) प्रश्न करना

(3) समझाना

(4) उपर्युक्त सभी

 

16. अधोलिखित वक्तव्यों में कौन तर्कसंगत नहीं है?

(1) शिक्षक अध्यापन कर सकते हैं

(2) शिक्षक शिक्षार्थियों में ज्ञान प्राप्त करने की आकांक्षा उत्पन्न कर सकते हैं

(3) चिन्तन-प्रक्रिया के विकास के लिये व्याख्यान प्रणाली का उपयोग किया जा सकता है

(4) शिक्षक पैदा होते हैं

 

17. प्राचीन भारत के प्रथम भारतीय इतिहासकार थे-

(1) मेगस्थनीज

(2) फाह्यान

(3) ह्वेनसांग

(4) कल्हण

 

18. निम्नलिखित वक्तव्यों में से कौन सही है?

(1) पाठ्यक्रम पाठ्य विवरण का अंग है

(2) पाठ्यक्रम पाठ्य विवरण का संलग्नक अंग है 

(3) पाठ्य विवरण उन सभी शिक्षण संस्थाओं का जो किसी विश्वविद्यालय विशेष से सम्बद्ध हैं, एक समान होता है

(4) पादयक्रम किसी विश्वविद्यालय विशेष से सम्बद्ध महाविद्यालयों में एक समान नहीं होते हैं

 

19. निम्नलिखित दो विकल्पों में 'समझ के स्तर के अनुरूप कोन है?

(A) संज्ञा की व्याख्या

(B) अपने शब्दों में संज्ञा की व्याख्या

 

(1) मात्र A

(2) मात्र B

(3) A एवं B दोनों

(4) A एवं B में से कोई नही

 

20. दूसरे पेशों की अपेक्षा अध्यापन को, किसी के द्वारा वरीयता क्‍यों दी जानी चाहिए ?

(1) मानवता की सेवा के लिए

(2) अध्यापन के प्रति प्रेम के लिए

(3) युवकों के प्रति प्रेम के लिए

(4) अध्यापन के विषय के ऊपर कौशल प्राप्ति के लिए

 

21. यदि छात्र क्लास में न आएँ, तो एक अध्यापक की हैसियत से आप क्‍या करेंगे?

(1) वास्तविकता की उपेक्षा 

(2) अध्यापन को रुचिकर तथा प्रभावी बनाने की कोशिश

(3) छात्रों को दण्ड

(4) कारण समझना तथा उसे दूर करना

 

22. निम्नलिस्वित में से एक विकल्प को चुनिए, जिसे आप उस समय सर्वोचित समझते हैं, जबकि छात्र अपनी कक्षा में ध्यान नही दे रहे हैं-

(1) इस समस्या की उपेक्षा

(2) छात्रों को दण्ड दीजिए

(3) छात्रों को ध्यान देने के लिए कहिए

(4) कारण समझिए

 

23. कक्षा-संचरण में विदुषता अधिकतर किस पर आधारित है?

(1) अध्यापक के ज्ञान की कमी

(2) छात्र के ज्ञान की कमी

(3) कक्षा में शोर

(4) कक्षा के बाहर शोर

 

24. भारत में उच्चतर शिक्षा संस्थानों को सुधारने के लिए सर्वोत्तम विकल्प का चयन कीजिए-

(1) लचीला पाठ्यक्रम विकेन्द्रीकृत परीक्षा

(2) लचीला पाठ्यक्रम केन्द्रीकृत परीक्षा

(3) सामान्‍य पाठ्यक्रम विकेन्द्रीकृत परीक्षा

(4) समान पादयक्रम केन्द्रीकृत परीक्षा

 

25. कोई छात्र कक्षा में बहुत प्रश्न पूछता है। आप क्‍या करेंगे?

(1) डॉटकर बैठा देंगे

(2) बाहर बुलाकर मना कर देंगे

(3) उपेक्षा करेंगे

(4) प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करेंगे

 

Answer- 1- (1), 2- (3), 3- (3), 4- (1), 5- (4), 6- (2), 7- (1), 8- (1), 9- (1), 10- (3), 11- (4), 12- (2), 13- (2), 14- (4), 15- (4), 16- (4), 17- (4), 18- (1), 19- (2), 20- (2), 21- (4), 22- (4), 23- (1), 24- (3), 25- (4)


Teaching Aptitude MCQ (download pdf) for ugc net (Part-1)

Teaching Aptitude MCQ Part-3

Comments

Popular posts from this blog

"चक्र " - मानव शरीर में वर्णित शक्ति केन्द्र

7 Chakras in Human Body हमारे शरीर में प्राण ऊर्जा का सूक्ष्म प्रवाह प्रत्येक नाड़ी के एक निश्चित मार्ग द्वारा होता है। और एक विशिष्ट बिन्दु पर इसका संगम होता है। यह बिन्दु प्राण अथवा आत्मिक शक्ति का केन्द्र होते है। योग में इन्हें चक्र कहा जाता है। चक्र हमारे शरीर में ऊर्जा के परिपथ का निर्माण करते हैं। यह परिपथ मेरूदण्ड में होता है। चक्र उच्च तलों से ऊर्जा को ग्रहण करते है तथा उसका वितरण मन और शरीर को करते है। 'चक्र' शब्द का अर्थ-  'चक्र' का शाब्दिक अर्थ पहिया या वृत्त माना जाता है। किन्तु इस संस्कृत शब्द का यौगिक दृष्टि से अर्थ चक्रवात या भँवर से है। चक्र अतीन्द्रिय शक्ति केन्द्रों की ऐसी विशेष तरंगे हैं, जो वृत्ताकार रूप में गतिमान रहती हैं। इन तरंगों को अनुभव किया जा सकता है। हर चक्र की अपनी अलग तरंग होती है। अलग अलग चक्र की तरंगगति के अनुसार अलग अलग रंग को घूर्णनशील प्रकाश के रूप में इन्हें देखा जाता है। योगियों ने गहन ध्यान की स्थिति में चक्रों को विभिन्न दलों व रंगों वाले कमल पुष्प के रूप में देखा। इसीलिए योगशास्त्र में इन चक्रों को 'शरीर का कमल पुष्प” कहा ग...

सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति सामान्य परिचय

प्रथम उपदेश- पिण्ड उत्पति विचार सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति अध्याय - 2 (पिण्ड विचार) सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति के अनुसार नौ चक्रो के नाम 1. ब्रहमचक्र - मूलाधार मे स्थित है, कामनाओं की पूर्ति होती हैं। 2. स्वाधिष्ठान चक्र - इससे हम चीजो को आकर्षित कर सकते है। 3. नाभी चक्र - सिद्धि की प्राप्ति होती है। 4. अनाहत चक्र - हृदय में स्थित होता है। 5. कण्ठचक्र - विशुद्धि-संकल्प पूर्ति, आवाज मधुर होती है। 6. तालुचक्र -  घटिका में, जिह्वा के मूल भाग में,  लय सिद्धि प्राप्त होती है। 7. भ्रुचक्र -     आज्ञा चक्र - वाणी की सिद्धि प्राप्त होती है। 8. निर्वाणचक्र - ब्रहमरन्ध्र, सहस्त्रार चक्र, मोक्ष प्राप्ति 9. आकाश चक्र - सहस्त्रारचक्र के ऊपर,  भय- द्वेष की समाप्ति होती है। सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति के अनुसार सोहल आधार (1) पादांगुष्ठ आधार (2) मूलाधार (3) गुदाद्वार आधार (4) मेद् आधार (5) उड्डियान आधार (6) नाभी आधार (7) हृदयाधार (8) कण्ठाधार (9) घटिकाधार (10) तालु आधार (11) जिह्वा आधार (12) भ्रूमध्य आधार (13) नासिका आधार (14) नासामूल कपाट आधार (15) ललाट आधार (16) ब्रहमरंध्र आधार सिद्ध...

हठयोग प्रदीपिका में वर्णित प्राणायाम

हठयोग प्रदीपिका में प्राणायाम को कुम्भक कहा है, स्वामी स्वात्माराम जी ने प्राणायामों का वर्णन करते हुए कहा है - सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारी शीतल्री तथा।  भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा प्लाविनीत्यष्टकुंम्भका:।। (हठयोगप्रदीपिका- 2/44) अर्थात् - सूर्यभेदन, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और प्लाविनी में आठ प्रकार के कुम्भक (प्राणायाम) है। इनका वर्णन ऩिम्न प्रकार है 1. सूर्यभेदी प्राणायाम - हठयोग प्रदीपिका में सूर्यभेदन या सूर्यभेदी प्राणायाम का वर्णन इस प्रकार किया गया है - आसने सुखदे योगी बदध्वा चैवासनं ततः।  दक्षनाड्या समाकृष्य बहिस्थं पवन शनै:।।  आकेशादानखाग्राच्च निरोधावधि क्रुंभयेत। ततः शनैः सव्य नाड्या रेचयेत् पवन शनै:।। (ह.प्र. 2/48/49) अर्थात- पवित्र और समतल स्थान में उपयुक्त आसन बिछाकर उसके ऊपर पद्मासन, स्वस्तिकासन आदि किसी आसन में सुखपूर्वक मेरुदण्ड, गर्दन और सिर को सीधा रखते हुए बैठेै। फिर दाहिने नासारन्ध्र अर्थात पिंगला नाडी से शनैः शनैः पूरक करें। आभ्यन्तर कुम्भक करें। कुम्भक के समय मूलबन्ध व जालन्धरबन्ध लगा कर रखें।  यथा शक्ति कुम्भक के प...

हठयोगप्रदीपिका में वर्णित मुद्रायें, बंध

  हठयोगप्रदीपिका में वर्णित मुद्रायें, बंध हठयोग प्रदीपिका में मुद्राओं का वर्णन करते हुए स्वामी स्वात्माराम जी ने कहा है महामुद्रा महाबन्धों महावेधश्च खेचरी।  उड़्डीयानं मूलबन्धस्ततो जालंधराभिध:। (हठयोगप्रदीपिका- 3/6 ) करणी विपरीताख्या बज़्रोली शक्तिचालनम्।  इदं हि मुद्रादश्क जरामरणनाशनम्।।  (हठयोगप्रदीपिका- 3/7) अर्थात महामुद्रा, महाबंध, महावेध, खेचरी, उड्डीयानबन्ध, मूलबन्ध, जालन्धरबन्ध, विपरीतकरणी, वज़्रोली और शक्तिचालनी ये दस मुद्रायें हैं। जो जरा (वृद्धा अवस्था) मरण (मृत्यु) का नाश करने वाली है। इनका वर्णन निम्न प्रकार है।  1. महामुद्रा- महामुद्रा का वर्णन करते हुए हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है- पादमूलेन वामेन योनिं सम्पीड्य दक्षिणम्।  प्रसारितं पद कृत्या कराभ्यां धारयेदृढम्।।  कंठे बंधं समारोप्य धारयेद्वायुमूर्ध्वतः।  यथा दण्डहतः सर्पों दंडाकारः प्रजायते  ऋज्वीभूता तथा शक्ति: कुण्डली सहसा भवेतत् ।।  (हठयोगप्रदीपिका- 3/9,10)  अर्थात् बायें पैर को एड़ी को गुदा और उपस्थ के मध्य सीवन पर दृढ़ता से लगाकर दाहिने पैर को फैला कर रखें...

चित्त | चित्तभूमि | चित्तवृत्ति

 चित्त  चित्त शब्द की व्युत्पत्ति 'चिति संज्ञाने' धातु से हुई है। ज्ञान की अनुभूति के साधन को चित्त कहा जाता है। जीवात्मा को सुख दुःख के भोग हेतु यह शरीर प्राप्त हुआ है। मनुष्य द्वारा जो भी अच्छा या बुरा कर्म किया जाता है, या सुख दुःख का भोग किया जाता है, वह इस शरीर के माध्यम से ही सम्भव है। कहा भी गया  है 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' अर्थात प्रत्येक कार्य को करने का साधन यह शरीर ही है। इस शरीर में कर्म करने के लिये दो प्रकार के साधन हैं, जिन्हें बाह्यकरण व अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। बाह्यकरण के अन्तर्गत हमारी 5 ज्ञानेन्द्रियां एवं 5 कर्मेन्द्रियां आती हैं। जिनका व्यापार बाहर की ओर अर्थात संसार की ओर होता है। बाह्य विषयों के साथ इन्द्रियों के सम्पर्क से अन्तर स्थित आत्मा को जिन साधनों से ज्ञान - अज्ञान या सुख - दुःख की अनुभूति होती है, उन साधनों को अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। यही अन्तःकरण चित्त के अर्थ में लिया जाता है। योग दर्शन में मन, बुद्धि, अहंकार इन तीनों के सम्मिलित रूप को चित्त के नाम से प्रदर्शित किया गया है। परन्तु वेदान्त दर्शन अन्तःकरण चतुष्टय की...

चित्त विक्षेप | योगान्तराय

चित्त विक्षेपों को ही योगान्तराय ' कहते है जो चित्त को विक्षिप्त करके उसकी एकाग्रता को नष्ट कर देते हैं उन्हें योगान्तराय अथवा योग के विध्न कहा जाता।  'योगस्य अन्तः मध्ये आयान्ति ते अन्तरायाः'।  ये योग के मध्य में आते हैं इसलिये इन्हें योगान्तराय कहा जाता है। विघ्नों से व्यथित होकर योग साधक साधना को बीच में ही छोड़कर चल देते हैं। विध्न आयें ही नहीं अथवा यदि आ जायें तो उनको सहने की शक्ति चित्त में आ जाये, ऐसी दया ईश्वर ही कर सकता है। यह तो सम्भव नहीं कि विध्न न आयें। “श्रेयांसि बहुविध्नानि' शुभकार्यों में विध्न आया ही करते हैं। उनसे टकराने का साहस योगसाधक में होना चाहिए। ईश्वर की अनुकम्पा से यह सम्भव होता है।  व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः (योगसूत्र - 1/30) योगसूत्र के अनुसार चित्त विक्षेपों  या अन्तरायों की संख्या नौ हैं- व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व। उक्त नौ अन्तराय ही चित्त को विक्षिप्त करते हैं। अतः ये योगविरोधी हैं इन्हें योग के मल...

आसन का अर्थ एवं परिभाषायें, आसनो के उद्देश्य

आसन का अर्थ आसन शब्द के अनेक अर्थ है जैसे  बैठने का ढंग, शरीर के अंगों की एक विशेष स्थिति, ठहर जाना, शत्रु के विरुद्ध किसी स्थान पर डटे रहना, हाथी के शरीर का अगला भाग, घोड़े का कन्धा, आसन अर्थात जिसके ऊपर बैठा जाता है। संस्कृत व्याकरंण के अनुसार आसन शब्द अस धातु से बना है जिसके दो अर्थ होते है। 1. बैठने का स्थान : जैसे दरी, मृग छाल, कालीन, चादर  2. शारीरिक स्थिति : अर्थात शरीर के अंगों की स्थिति  आसन की परिभाषा हम जिस स्थिति में रहते है वह आसन उसी नाम से जाना जाता है। जैसे मुर्गे की स्थिति को कुक्कुटासन, मयूर की स्थिति को मयूरासन। आसनों को विभिन्न ग्रन्थों में अलग अलग तरीके से परिभाषित किया है। महर्षि पतंजलि के अनुसार आसन की परिभाषा-   महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के साधन पाद में आसन को परिभाषित करते हुए कहा है। 'स्थिरसुखमासनम्' योगसूत्र 2/46  अर्थात स्थिरता पूर्वक रहकर जिसमें सुख की अनुभूति हो वह आसन है। उक्त परिभाषा का अगर विवेचन करे तो हम कह सकते है शरीर को बिना हिलाए, डुलाए अथवा चित्त में किसी प्रकार का उद्वेग हुए बिना चिरकाल तक निश्चल होकर एक ही स्थिति में सु...

Information and Communication Technology विषय पर MCQs (Set-3)

  1. "HTTPS" में "P" का अर्थ क्या है? A) Process B) Packet C) Protocol D) Program ANSWER= (C) Protocol Check Answer   2. कौन-सा उपकरण 'डेटा' को डिजिटल रूप में परिवर्तित करता है? A) हब B) मॉडेम C) राउटर D) स्विच ANSWER= (B) मॉडेम Check Answer   3. किस प्रोटोकॉल का उपयोग 'ईमेल' भेजने के लिए किया जाता है? A) SMTP B) HTTP C) FTP D) POP3 ANSWER= (A) SMTP Check Answer   4. 'क्लाउड स्टोरेज' सेवा का एक उदाहरण क्या है? A) Paint B) Notepad C) MS Word D) Google Drive ANSWER= (D) Google Drive Check Answer   5. 'Firewall' का मुख्य कार्य क्या है? A) फाइल्स को एनक्रिप्ट करना B) डेटा को बैकअप करना C) नेटवर्क को सुरक्षित करना D) वायरस को स्कैन करना ANSWER= (C) नेटवर्क को सुरक्षित करना Check Answer   6. 'VPN' का पू...

हठयोग प्रदीपिका के अनुसार षट्कर्म

हठप्रदीपिका के अनुसार षट्कर्म हठयोगप्रदीपिका हठयोग के महत्वपूर्ण ग्रन्थों में से एक हैं। इस ग्रन्थ के रचयिता योगी स्वात्माराम जी हैं। हठयोग प्रदीपिका के द्वितीय अध्याय में षटकर्मों का वर्णन किया गया है। षटकर्मों का वर्णन करते हुए स्वामी स्वात्माराम  जी कहते हैं - धौतिर्बस्तिस्तथा नेतिस्त्राटकं नौलिकं तथा।  कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि प्रचक्षते।। (हठयोग प्रदीपिका-2/22) अर्थात- धौति, बस्ति, नेति, त्राटक, नौलि और कपालभोंति ये छ: कर्म हैं। बुद्धिमान योगियों ने इन छः कर्मों को योगमार्ग में करने का निर्देश किया है। इन छह कर्मों के अतिरिक्त गजकरणी का भी हठयोगप्रदीपिका में वर्णन किया गया है। वैसे गजकरणी धौतिकर्म के अन्तर्गत ही आ जाती है। इनका वर्णन निम्नलिखित है 1. धौति-  धौँति क्रिया की विधि और  इसके लाभ एवं सावधानी- धौँतिकर्म के अन्तर्गत हठयोग प्रदीपिका में केवल वस्त्र धौति का ही वर्णन किया गया है। धौति क्रिया का वर्णन करते हुए योगी स्वात्माराम जी कहते हैं- चतुरंगुल विस्तारं हस्तपंचदशायतम। . गुरूपदिष्टमार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैर्गसेत्।।  पुनः प्रत्याहरेच्चैतदुदितं ध...

Yoga MCQ Questions Answers in Hindi

 Yoga multiple choice questions in Hindi for UGC NET JRF Yoga, QCI Yoga, YCB Exam नोट :- इस प्रश्नपत्र में (25) बहुसंकल्पीय प्रश्न है। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक है। सभी प्रश्न अनिवार्य ।   1. किस उपनिषद्‌ में ओंकार के चार चरणों का उल्लेख किया गया है? (1) प्रश्नोपनिषद्‌         (2) मुण्डकोपनिषद्‌ (3) माण्डूक्योपनिषद्‌  (4) कठोपनिषद्‌ 2 योग वासिष्ठ में निम्नलिखित में से किस पर बल दिया गया है? (1) ज्ञान योग  (2) मंत्र योग  (3) राजयोग  (4) भक्ति योग 3. पुरुष और प्रकृति निम्नलिखित में से किस दर्शन की दो मुख्य अवधारणाएं हैं ? (1) वेदांत           (2) सांख्य (3) पूर्व मीमांसा (4) वैशेषिक 4. निम्नांकित में से कौन-सी नाड़ी दस मुख्य नाडियों में शामिल नहीं है? (1) अलम्बुषा  (2) कुहू  (3) कूर्म  (4) शंखिनी 5. योगवासिष्ठानुसार निम्नलिखित में से क्या ज्ञानभूमिका के अन्तर्गत नहीं आता है? (1) शुभेच्छा (2) विचारणा (3) सद्भावना (4) तनुमानसा 6. प्रश्नो...