Skip to main content

ईशावास्योपनिषद: (Ishavasyopanishad) का परिचय

उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। वेदों के अंतिम भाग के रूप में, उपनिषद गूढ़ रहस्यों और दार्शनिक अवधारणाओं की व्याख्या करते हैं। ईशावास्योपनिषद, जो कि यजुर्वेद के शुक्ल शाखा में संकलित है, अद्वैत वेदांत के मूल सिद्धांतों को प्रस्तुत करता है। यह उपनिषद छोटा होते हुए भी अत्यंत सारगर्भित है और आत्मा, ब्रह्म और जीवन के परम उद्देश्य के विषय में गहरी समझ प्रदान करता है।

नाम और अर्थ 'ईशावास्योपनिषद' शब्द दो भागों में विभाजित किया जा सकता है: 'ईशा' जिसका अर्थ है 'ईश्वर' और 'वास्य' जिसका अर्थ है 'व्याप्त' इसका तात्पर्य यह है कि संपूर्ण सृष्टि में ईश्वर की व्यापकता है। यह उपनिषद हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि संसार में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से ओत-प्रोत है।

इस उपनिषद में कुल 18 श्लोक हैं, जिनमें गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों का समावेश है। प्रथम श्लोक ही इसकी संपूर्ण शिक्षा को समाहित करता है:

"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किं जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥"

इसका अर्थ है कि यह समस्त जगत ईश्वर से व्याप्त है, अतः हमें त्यागपूर्वक इसका उपभोग करना चाहिए और लोभ का त्याग करना चाहिए।

ईशावास्योपनिषद का दार्शनिक दृष्टिकोण ईशावास्योपनिषद के प्रमुख विचार निम्नलिखित हैं:

ज्ञाननिष्ठा का स्वरूप

ज्ञाननिष्ठा का अर्थ है आत्म-ज्ञान और ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति के प्रति पूर्णतः समर्पित होना। उपनिषदों के अनुसार, ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है और सच्चा ज्ञान वही है जो आत्मा और परमात्मा के स्वरूप को प्रकट करता है। ईशावास्योपनिषद में ज्ञाननिष्ठा का वर्णन इस प्रकार किया गया है:

"अन्धं तमः प्रविशन्ति ये अविद्यायामुपासते। ततो भूय इव ते तमो विद्यायां रताः॥"

अर्थात् जो केवल अज्ञान में डूबे रहते हैं, वे अंधकार में प्रवेश करते हैं; किंतु जो केवल ज्ञान की साधना करते हैं और कर्म को छोड़ देते हैं, वे भी अंधकार में जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि केवल ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, जब तक वह व्यवहारिक जीवन में संतुलित न हो।

ज्ञाननिष्ठा का प्रमुख उद्देश्य यह है कि व्यक्ति आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझे और माया के भ्रम से मुक्त होकर ब्रह्म में स्थित हो जाए।

कर्मनिष्ठा का स्वरूप

कर्मनिष्ठा का तात्पर्य है निःस्वार्थ भाव से कर्म में संलग्न रहना। ईशावास्योपनिषद का दूसरा मंत्र कर्मनिष्ठा की महिमा को दर्शाता है:

"कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति कर्म लिप्यते नरे॥"

इसका अर्थ यह है कि मनुष्य को सौ वर्षों तक भी कर्म करते हुए जीने की इच्छा करनी चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से वह पाप से मुक्त रहता है। इस मंत्र में निष्काम कर्मयोग का आदर्श प्रस्तुत किया गया है, जिसे गीता में श्रीकृष्ण ने भी प्रतिपादित किया है।

कर्मनिष्ठ व्यक्ति अपने जीवन में हर कार्य को समर्पण भाव से करता है और फल की चिंता किए बिना अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करता है। यही कर्मयोग का सार है।

ईशावास्योपनिषद हमें यह सिखाता है कि केवल ज्ञान या केवल कर्म पर्याप्त नहीं है, बल्कि इन दोनों का समन्वय ही जीवन को सफल और सार्थक बनाता है। ज्ञान व्यक्ति को आत्मबोध कराता है, जबकि कर्म उसे समाज और संसार से जोड़ता है। यदि हम ईशावास्योपनिषद की शिक्षाओं को अपने जीवन में आत्मसात करें, तो हम संतुलित जीवन जीते हुए आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर हो सकते हैं। अतः, हमें ज्ञाननिष्ठ और कर्मनिष्ठ दोनों ही मार्गों को अपनाकर एक श्रेष्ठ जीवन की ओर बढ़ना चाहिए।

सर्व करुणा ब्रह्म की अवधारणा

"ईशावास्योपनिषद" का मुख्य तत्व "सर्व करुणा ब्रह्म" और "ऋषि का स्वभाव" है। यह उपनिषद यह प्रतिपादित करता है कि समस्त विश्व ब्रह्म से व्याप्त है और सभी प्राणियों में ब्रह्म का वास है। यह विचार आध्यात्मिकता में करुणा और सह-अस्तित्व की भावना को जन्म देता है।

"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्यां जगत्।"

इस उपनिषद का पहला श्लोक ही ब्रह्म की सर्वव्यापकता की उद्घोषणा करता है। इसका तात्पर्य है कि इस समस्त सृष्टि में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से व्याप्त है। जब समस्त जगत ब्रह्म का ही स्वरूप है, तब हर जीव, हर वस्तु और हर कण में ब्रह्म की उपस्थिति होती है।

इस उपनिषद में करुणा और समता की भावना को महत्व दिया गया है। यदि हर प्राणी में एक ही ब्रह्म का वास है, तो अन्य जीवों के प्रति करुणा रखना ही ब्रह्म को साक्षात करने का मार्ग है। यही कारण है कि भारतीय संतों, महापुरुषों और योगियों ने अहिंसा, प्रेम और करुणा को अपने जीवन का मूल बनाया।

ऋषि का स्वभाव और उनकी दृष्टि

ऋषि वे होते हैं जिन्होंने अपने जीवन में सत्य, करुणा, तपस्या और ज्ञान को धारण किया हो। उनका स्वभाव एकरस, शांत, समदर्शी और दयालु होता है। वे सभी जीवों में एक समान ब्रह्म को देखने की क्षमता रखते हैं। "विद्यां चाविद्यां यस्तद्वेदोभयं सह।" यह श्लोक ज्ञान और अज्ञान, दोनों की सम्यक दृष्टि को आवश्यक बताता है। ऋषि का स्वभाव तटस्थ और करुणामय होता है।

ऋषि केवल आत्मज्ञान प्राप्त करते हैं, बल्कि वे दूसरों के कल्याण के लिए भी कार्य करते हैं। ईशावास्योपनिषद में निष्काम कर्म की भावना को प्रमुखता दी गई है।

ईशावास्योपनिषद में सर्व करुणा ब्रह्म और ऋषि के स्वभाव को परिभाषित किया गया है। इसमें बताया गया है कि हर प्राणी में ब्रह्म का निवास है, और जब हम इस तथ्य को स्वीकार करते हैं, तब हमारे भीतर करुणा, प्रेम और दया का भाव विकसित होता है। यह उपनिषद हमें सिखाता है कि एक सच्चे ऋषि का स्वभाव कैसा होना चाहिएतपस्वी, ज्ञानवान और करुणामय। यही विचार मानवता के कल्याण और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

मरते हुए मनुष्य की प्रार्थना

ईशावास्योपनिषद का अंतिम श्लोक मृत्यु के समय व्यक्ति द्वारा की जाने वाली प्रार्थना को दर्शाता है:

"अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विस्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम।।"

इस श्लोक का अर्थ है: हे अग्निदेव! हमें उत्तम मार्ग से ले चलो। आप सब कुछ जानते हैं, हमें सद्गति प्रदान करो। हमारे समस्त पापों को दूर कर दो, ताकि हम परमात्मा की शरण में जा सकें। हम आपकी स्तुति और वंदना करते हैं।

यह श्लोक यह दर्शाता है कि जब मनुष्य मृत्यु के समीप होता है, तब वह ईश्वर से निवेदन करता है कि उसे अज्ञान और अंधकार से बाहर निकालकर सत्य और प्रकाश की ओर ले जाया जाए। यह प्रार्थना व्यक्ति के आत्मकल्याण और मोक्ष की दिशा में उठाया गया अंतिम कदम होती है।

इस प्रार्थना का आध्यात्मिक महत्व

1. अंतिम सत्य की ओर गमन: मृत्यु के समय मनुष्य अपने पूरे जीवन के कर्मों का अवलोकन करता है। यदि उसने अपने जीवन में सद्कर्म किए हैं, तो वह भयमुक्त होकर ईश्वर से अपने अंतिम गमन के लिए प्रार्थना करता है।

2. अज्ञान का नाश: इस प्रार्थना में व्यक्ति ईश्वर से निवेदन करता है कि वह उसे मोह-माया से दूर कर सत्य की ओर ले जाए।

3. आत्मा की मुक्ति: यह प्रार्थना मोक्ष प्राप्ति की दिशा में उठाया गया अंतिम आध्यात्मिक प्रयास है। यह व्यक्ति की आत्मा को ब्रह्म से मिलाने का माध्यम बनती है।

4. निष्काम कर्म का संदेश: यह उपनिषद जीवनभर निष्काम कर्म करने और अंत में ईश्वर के शरणागत होने का संदेश देता है। यह बताता है कि मनुष्य को अपने जीवन में निष्काम भाव से सेवा और भक्ति करनी चाहिए, ताकि मृत्यु के समय वह भयमुक्त हो सके।

ईशावास्योपनिषद का सार

इस उपनिषद का मुख्य संदेश यह है कि यह समस्त ब्रह्मांड ईश्वर से व्याप्त है और हमें अपनी इच्छाओं को त्यागकर ईश्वर के प्रति समर्पित भाव रखना चाहिए। यह कर्मयोग तथा ज्ञानयोग दोनों का समन्वय करता है। मनुष्य को जीवनभर निष्काम कर्म करते हुए ईश्वर की उपासना करनी चाहिए, ताकि अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ति हो सके। मृत्यु के समय जब आत्मा अपने परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होती है, तब वह ईश्वर से यह प्रार्थना करती है कि उसे सत्य की ओर ले जाया जाए।

केनोपनिषद् (Kenopanishad) का परिचय

भक्तियोग, नवधा भक्ति

गायत्री- मन्त्र  का अर्थ

Comments

Popular posts from this blog

"चक्र " - मानव शरीर में वर्णित शक्ति केन्द्र

7 Chakras in Human Body हमारे शरीर में प्राण ऊर्जा का सूक्ष्म प्रवाह प्रत्येक नाड़ी के एक निश्चित मार्ग द्वारा होता है। और एक विशिष्ट बिन्दु पर इसका संगम होता है। यह बिन्दु प्राण अथवा आत्मिक शक्ति का केन्द्र होते है। योग में इन्हें चक्र कहा जाता है। चक्र हमारे शरीर में ऊर्जा के परिपथ का निर्माण करते हैं। यह परिपथ मेरूदण्ड में होता है। चक्र उच्च तलों से ऊर्जा को ग्रहण करते है तथा उसका वितरण मन और शरीर को करते है। 'चक्र' शब्द का अर्थ-  'चक्र' का शाब्दिक अर्थ पहिया या वृत्त माना जाता है। किन्तु इस संस्कृत शब्द का यौगिक दृष्टि से अर्थ चक्रवात या भँवर से है। चक्र अतीन्द्रिय शक्ति केन्द्रों की ऐसी विशेष तरंगे हैं, जो वृत्ताकार रूप में गतिमान रहती हैं। इन तरंगों को अनुभव किया जा सकता है। हर चक्र की अपनी अलग तरंग होती है। अलग अलग चक्र की तरंगगति के अनुसार अलग अलग रंग को घूर्णनशील प्रकाश के रूप में इन्हें देखा जाता है। योगियों ने गहन ध्यान की स्थिति में चक्रों को विभिन्न दलों व रंगों वाले कमल पुष्प के रूप में देखा। इसीलिए योगशास्त्र में इन चक्रों को 'शरीर का कमल पुष्प” कहा ग...

सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति सामान्य परिचय

प्रथम उपदेश- पिण्ड उत्पति विचार सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति अध्याय - 2 (पिण्ड विचार) सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति के अनुसार नौ चक्रो के नाम 1. ब्रहमचक्र - मूलाधार मे स्थित है, कामनाओं की पूर्ति होती हैं। 2. स्वाधिष्ठान चक्र - इससे हम चीजो को आकर्षित कर सकते है। 3. नाभी चक्र - सिद्धि की प्राप्ति होती है। 4. अनाहत चक्र - हृदय में स्थित होता है। 5. कण्ठचक्र - विशुद्धि-संकल्प पूर्ति, आवाज मधुर होती है। 6. तालुचक्र -  घटिका में, जिह्वा के मूल भाग में,  लय सिद्धि प्राप्त होती है। 7. भ्रुचक्र -     आज्ञा चक्र - वाणी की सिद्धि प्राप्त होती है। 8. निर्वाणचक्र - ब्रहमरन्ध्र, सहस्त्रार चक्र, मोक्ष प्राप्ति 9. आकाश चक्र - सहस्त्रारचक्र के ऊपर,  भय- द्वेष की समाप्ति होती है। सिद्ध-सिद्धांत-पद्धति के अनुसार सोहल आधार (1) पादांगुष्ठ आधार (2) मूलाधार (3) गुदाद्वार आधार (4) मेद् आधार (5) उड्डियान आधार (6) नाभी आधार (7) हृदयाधार (8) कण्ठाधार (9) घटिकाधार (10) तालु आधार (11) जिह्वा आधार (12) भ्रूमध्य आधार (13) नासिका आधार (14) नासामूल कपाट आधार (15) ललाट आधार (16) ब्रहमरंध्र आधार सिद्ध...

हठयोग प्रदीपिका में वर्णित प्राणायाम

हठयोग प्रदीपिका में प्राणायाम को कुम्भक कहा है, स्वामी स्वात्माराम जी ने प्राणायामों का वर्णन करते हुए कहा है - सूर्यभेदनमुज्जायी सीत्कारी शीतल्री तथा।  भस्त्रिका भ्रामरी मूर्च्छा प्लाविनीत्यष्टकुंम्भका:।। (हठयोगप्रदीपिका- 2/44) अर्थात् - सूर्यभेदन, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और प्लाविनी में आठ प्रकार के कुम्भक (प्राणायाम) है। इनका वर्णन ऩिम्न प्रकार है 1. सूर्यभेदी प्राणायाम - हठयोग प्रदीपिका में सूर्यभेदन या सूर्यभेदी प्राणायाम का वर्णन इस प्रकार किया गया है - आसने सुखदे योगी बदध्वा चैवासनं ततः।  दक्षनाड्या समाकृष्य बहिस्थं पवन शनै:।।  आकेशादानखाग्राच्च निरोधावधि क्रुंभयेत। ततः शनैः सव्य नाड्या रेचयेत् पवन शनै:।। (ह.प्र. 2/48/49) अर्थात- पवित्र और समतल स्थान में उपयुक्त आसन बिछाकर उसके ऊपर पद्मासन, स्वस्तिकासन आदि किसी आसन में सुखपूर्वक मेरुदण्ड, गर्दन और सिर को सीधा रखते हुए बैठेै। फिर दाहिने नासारन्ध्र अर्थात पिंगला नाडी से शनैः शनैः पूरक करें। आभ्यन्तर कुम्भक करें। कुम्भक के समय मूलबन्ध व जालन्धरबन्ध लगा कर रखें।  यथा शक्ति कुम्भक के प...

हठयोगप्रदीपिका में वर्णित मुद्रायें, बंध

  हठयोगप्रदीपिका में वर्णित मुद्रायें, बंध हठयोग प्रदीपिका में मुद्राओं का वर्णन करते हुए स्वामी स्वात्माराम जी ने कहा है महामुद्रा महाबन्धों महावेधश्च खेचरी।  उड़्डीयानं मूलबन्धस्ततो जालंधराभिध:। (हठयोगप्रदीपिका- 3/6 ) करणी विपरीताख्या बज़्रोली शक्तिचालनम्।  इदं हि मुद्रादश्क जरामरणनाशनम्।।  (हठयोगप्रदीपिका- 3/7) अर्थात महामुद्रा, महाबंध, महावेध, खेचरी, उड्डीयानबन्ध, मूलबन्ध, जालन्धरबन्ध, विपरीतकरणी, वज़्रोली और शक्तिचालनी ये दस मुद्रायें हैं। जो जरा (वृद्धा अवस्था) मरण (मृत्यु) का नाश करने वाली है। इनका वर्णन निम्न प्रकार है।  1. महामुद्रा- महामुद्रा का वर्णन करते हुए हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है- पादमूलेन वामेन योनिं सम्पीड्य दक्षिणम्।  प्रसारितं पद कृत्या कराभ्यां धारयेदृढम्।।  कंठे बंधं समारोप्य धारयेद्वायुमूर्ध्वतः।  यथा दण्डहतः सर्पों दंडाकारः प्रजायते  ऋज्वीभूता तथा शक्ति: कुण्डली सहसा भवेतत् ।।  (हठयोगप्रदीपिका- 3/9,10)  अर्थात् बायें पैर को एड़ी को गुदा और उपस्थ के मध्य सीवन पर दृढ़ता से लगाकर दाहिने पैर को फैला कर रखें...

चित्त | चित्तभूमि | चित्तवृत्ति

 चित्त  चित्त शब्द की व्युत्पत्ति 'चिति संज्ञाने' धातु से हुई है। ज्ञान की अनुभूति के साधन को चित्त कहा जाता है। जीवात्मा को सुख दुःख के भोग हेतु यह शरीर प्राप्त हुआ है। मनुष्य द्वारा जो भी अच्छा या बुरा कर्म किया जाता है, या सुख दुःख का भोग किया जाता है, वह इस शरीर के माध्यम से ही सम्भव है। कहा भी गया  है 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' अर्थात प्रत्येक कार्य को करने का साधन यह शरीर ही है। इस शरीर में कर्म करने के लिये दो प्रकार के साधन हैं, जिन्हें बाह्यकरण व अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। बाह्यकरण के अन्तर्गत हमारी 5 ज्ञानेन्द्रियां एवं 5 कर्मेन्द्रियां आती हैं। जिनका व्यापार बाहर की ओर अर्थात संसार की ओर होता है। बाह्य विषयों के साथ इन्द्रियों के सम्पर्क से अन्तर स्थित आत्मा को जिन साधनों से ज्ञान - अज्ञान या सुख - दुःख की अनुभूति होती है, उन साधनों को अन्तःकरण के नाम से जाना जाता है। यही अन्तःकरण चित्त के अर्थ में लिया जाता है। योग दर्शन में मन, बुद्धि, अहंकार इन तीनों के सम्मिलित रूप को चित्त के नाम से प्रदर्शित किया गया है। परन्तु वेदान्त दर्शन अन्तःकरण चतुष्टय की...

चित्त विक्षेप | योगान्तराय

चित्त विक्षेपों को ही योगान्तराय ' कहते है जो चित्त को विक्षिप्त करके उसकी एकाग्रता को नष्ट कर देते हैं उन्हें योगान्तराय अथवा योग के विध्न कहा जाता।  'योगस्य अन्तः मध्ये आयान्ति ते अन्तरायाः'।  ये योग के मध्य में आते हैं इसलिये इन्हें योगान्तराय कहा जाता है। विघ्नों से व्यथित होकर योग साधक साधना को बीच में ही छोड़कर चल देते हैं। विध्न आयें ही नहीं अथवा यदि आ जायें तो उनको सहने की शक्ति चित्त में आ जाये, ऐसी दया ईश्वर ही कर सकता है। यह तो सम्भव नहीं कि विध्न न आयें। “श्रेयांसि बहुविध्नानि' शुभकार्यों में विध्न आया ही करते हैं। उनसे टकराने का साहस योगसाधक में होना चाहिए। ईश्वर की अनुकम्पा से यह सम्भव होता है।  व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः (योगसूत्र - 1/30) योगसूत्र के अनुसार चित्त विक्षेपों  या अन्तरायों की संख्या नौ हैं- व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व और अनवस्थितत्व। उक्त नौ अन्तराय ही चित्त को विक्षिप्त करते हैं। अतः ये योगविरोधी हैं इन्हें योग के मल...

आसन का अर्थ एवं परिभाषायें, आसनो के उद्देश्य

आसन का अर्थ आसन शब्द के अनेक अर्थ है जैसे  बैठने का ढंग, शरीर के अंगों की एक विशेष स्थिति, ठहर जाना, शत्रु के विरुद्ध किसी स्थान पर डटे रहना, हाथी के शरीर का अगला भाग, घोड़े का कन्धा, आसन अर्थात जिसके ऊपर बैठा जाता है। संस्कृत व्याकरंण के अनुसार आसन शब्द अस धातु से बना है जिसके दो अर्थ होते है। 1. बैठने का स्थान : जैसे दरी, मृग छाल, कालीन, चादर  2. शारीरिक स्थिति : अर्थात शरीर के अंगों की स्थिति  आसन की परिभाषा हम जिस स्थिति में रहते है वह आसन उसी नाम से जाना जाता है। जैसे मुर्गे की स्थिति को कुक्कुटासन, मयूर की स्थिति को मयूरासन। आसनों को विभिन्न ग्रन्थों में अलग अलग तरीके से परिभाषित किया है। महर्षि पतंजलि के अनुसार आसन की परिभाषा-   महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के साधन पाद में आसन को परिभाषित करते हुए कहा है। 'स्थिरसुखमासनम्' योगसूत्र 2/46  अर्थात स्थिरता पूर्वक रहकर जिसमें सुख की अनुभूति हो वह आसन है। उक्त परिभाषा का अगर विवेचन करे तो हम कह सकते है शरीर को बिना हिलाए, डुलाए अथवा चित्त में किसी प्रकार का उद्वेग हुए बिना चिरकाल तक निश्चल होकर एक ही स्थिति में सु...

Information and Communication Technology विषय पर MCQs (Set-3)

  1. "HTTPS" में "P" का अर्थ क्या है? A) Process B) Packet C) Protocol D) Program ANSWER= (C) Protocol Check Answer   2. कौन-सा उपकरण 'डेटा' को डिजिटल रूप में परिवर्तित करता है? A) हब B) मॉडेम C) राउटर D) स्विच ANSWER= (B) मॉडेम Check Answer   3. किस प्रोटोकॉल का उपयोग 'ईमेल' भेजने के लिए किया जाता है? A) SMTP B) HTTP C) FTP D) POP3 ANSWER= (A) SMTP Check Answer   4. 'क्लाउड स्टोरेज' सेवा का एक उदाहरण क्या है? A) Paint B) Notepad C) MS Word D) Google Drive ANSWER= (D) Google Drive Check Answer   5. 'Firewall' का मुख्य कार्य क्या है? A) फाइल्स को एनक्रिप्ट करना B) डेटा को बैकअप करना C) नेटवर्क को सुरक्षित करना D) वायरस को स्कैन करना ANSWER= (C) नेटवर्क को सुरक्षित करना Check Answer   6. 'VPN' का पू...

हठयोग प्रदीपिका के अनुसार षट्कर्म

हठप्रदीपिका के अनुसार षट्कर्म हठयोगप्रदीपिका हठयोग के महत्वपूर्ण ग्रन्थों में से एक हैं। इस ग्रन्थ के रचयिता योगी स्वात्माराम जी हैं। हठयोग प्रदीपिका के द्वितीय अध्याय में षटकर्मों का वर्णन किया गया है। षटकर्मों का वर्णन करते हुए स्वामी स्वात्माराम  जी कहते हैं - धौतिर्बस्तिस्तथा नेतिस्त्राटकं नौलिकं तथा।  कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि प्रचक्षते।। (हठयोग प्रदीपिका-2/22) अर्थात- धौति, बस्ति, नेति, त्राटक, नौलि और कपालभोंति ये छ: कर्म हैं। बुद्धिमान योगियों ने इन छः कर्मों को योगमार्ग में करने का निर्देश किया है। इन छह कर्मों के अतिरिक्त गजकरणी का भी हठयोगप्रदीपिका में वर्णन किया गया है। वैसे गजकरणी धौतिकर्म के अन्तर्गत ही आ जाती है। इनका वर्णन निम्नलिखित है 1. धौति-  धौँति क्रिया की विधि और  इसके लाभ एवं सावधानी- धौँतिकर्म के अन्तर्गत हठयोग प्रदीपिका में केवल वस्त्र धौति का ही वर्णन किया गया है। धौति क्रिया का वर्णन करते हुए योगी स्वात्माराम जी कहते हैं- चतुरंगुल विस्तारं हस्तपंचदशायतम। . गुरूपदिष्टमार्गेण सिक्तं वस्त्रं शनैर्गसेत्।।  पुनः प्रत्याहरेच्चैतदुदितं ध...

Yoga MCQ Questions Answers in Hindi

 Yoga multiple choice questions in Hindi for UGC NET JRF Yoga, QCI Yoga, YCB Exam नोट :- इस प्रश्नपत्र में (25) बहुसंकल्पीय प्रश्न है। प्रत्येक प्रश्न के दो (2) अंक है। सभी प्रश्न अनिवार्य ।   1. किस उपनिषद्‌ में ओंकार के चार चरणों का उल्लेख किया गया है? (1) प्रश्नोपनिषद्‌         (2) मुण्डकोपनिषद्‌ (3) माण्डूक्योपनिषद्‌  (4) कठोपनिषद्‌ 2 योग वासिष्ठ में निम्नलिखित में से किस पर बल दिया गया है? (1) ज्ञान योग  (2) मंत्र योग  (3) राजयोग  (4) भक्ति योग 3. पुरुष और प्रकृति निम्नलिखित में से किस दर्शन की दो मुख्य अवधारणाएं हैं ? (1) वेदांत           (2) सांख्य (3) पूर्व मीमांसा (4) वैशेषिक 4. निम्नांकित में से कौन-सी नाड़ी दस मुख्य नाडियों में शामिल नहीं है? (1) अलम्बुषा  (2) कुहू  (3) कूर्म  (4) शंखिनी 5. योगवासिष्ठानुसार निम्नलिखित में से क्या ज्ञानभूमिका के अन्तर्गत नहीं आता है? (1) शुभेच्छा (2) विचारणा (3) सद्भावना (4) तनुमानसा 6. प्रश्नो...