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कठोपनिषद (Kathopanishad) का परिचय

 कठोपनिषद प्रमुख उपनिषदों में से एक है और यह कृष्ण यजुर्वेद से संबद्ध है। इसे भारतीय दर्शन, विशेष रूप से अद्वैत वेदांत और सांख्य दर्शन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस उपनिषद में आत्मा, मृत्यु, मोक्ष और ब्रह्म की गूढ़ व्याख्या की गई है। कठोपनिषद का मुख्य कथानक नचिकेता और यमराज के संवाद पर आधारित है, जिसमें नचिकेता आत्मज्ञान और ब्रह्मविद्या के रहस्यों को जानने के लिए यमराज से गहन प्रश्न पूछते हैं।  कठोपनिषद को दो अध्यायों में विभाजित किया गया है, और प्रत्येक अध्याय में तीन-तीन वल्ली (खंड) होते हैं। इसका मूल विषय आत्मा और परमात्मा का स्वरूप है, जो नचिकेता और यमराज के संवाद के माध्यम से समझाया गया है। यम-नचिकेता संवाद  इस उपनिषद की कथा एक ऋषि वाजश्रवस के पुत्र नचिकेता से प्रारंभ होती है, जिसे उसके पिता ने यज्ञ के दौरान क्रोधित होकर यमराज को दान कर दिया। नचिकेता मृत्यु के देवता यमराज के पास पहुंचता है और उनसे तीन वरदान मांगता है। पहला वरदान: अपने पिता की शांति और प्रेम प्राप्त करना। दूसरा वरदान: स्वर्गलोक प्राप्त करने की विधि का ज्ञान। तीसरा वरदान: मृत्यु के ...

केनोपनिषद् (Kenopanishad) का परिचय

केनोपनिषद् वेदों के सामवेद शाखा से संबंधित है और यह तलवकार ब्राह्मण के अंतर्गत आता है। इस उपनिषद् का नाम " केन " शब्द पर आधारित है , जिसका अर्थ है " किसके द्वारा " । यह उपनिषद् मुख्य रूप से उस मूल सत्ता की खोज करता है , जो संपूर्ण ब्रह्मांड को नियंत्रित और क्रियाशील बनाती है। इसका प्रमुख विषय ब्रह्म और आत्मा का पारस्परिक संबंध है। केनोपनिषद् कुल चार खंडों में विभाजित है : प्रथम खंड - इसमें यह प्रश्न उठाया गया है कि किसके द्वारा इंद्रियाँ , मन और प्राण संचालित होते हैं। उत्तर में बताया गया है कि वह परमात्मा ही इन सबका कारण है। द्वितीय खंड - इस खंड में ब्रह्म की अपरिभाषेयता और अनुभव की महत्ता पर बल दिया गया है। यह स्पष्ट किया गया है कि ब्रह्म किसी भी इंद्रिय या मन द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता , बल्कि यह आत्मसाक्षात्कार से ही जाना जा सकता है। तृतीय खंड - इसमें एक कथा द्वारा ब्रह्म के सर्वोच्च स्थान को प्रमाणित किया गय...

ईशावास्योपनिषद: (Ishavasyopanishad) का परिचय

उपनिषद भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग हैं। वेदों के अंतिम भाग के रूप में , उपनिषद गूढ़ रहस्यों और दार्शनिक अवधारणाओं की व्याख्या करते हैं। ईशावास्योपनिषद , जो कि यजुर्वेद के शुक्ल शाखा में संकलित है , अद्वैत वेदांत के मूल सिद्धांतों को प्रस्तुत करता है। यह उपनिषद छोटा होते हुए भी अत्यंत सारगर्भित है और आत्मा , ब्रह्म और जीवन के परम उद्देश्य के विषय में गहरी समझ प्रदान करता है। नाम और अर्थ ' ईशावास्योपनिषद ' शब्द दो भागों में विभाजित किया जा सकता है : ' ईशा ' जिसका अर्थ है ' ईश्वर ' और ' वास्य ' जिसका अर्थ है ' व्याप्त ' । इसका तात्पर्य यह है कि संपूर्ण सृष्टि में ईश्वर की व्यापकता है। यह उपनिषद हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि संसार में जो कुछ भी है , वह ईश्वर से ओत - प्रोत है। इस उपनिषद में कुल 18 श्लोक हैं , जिनमें गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों का समावेश है। प्रथम श्लोक ही इसकी संपूर्ण शिक्षा को ...